पृष्ठ

सोमवार, अगस्त 07, 2017

धर्म ( कहानी )

धर्म ( कहानी )
         अभी-अभी परसों की बात हैअरविन्द जी पूरे जोर -शोर से धर्म की वकालत किये जा रहे थे तभी हमदम जी आ खड़े हुए थे, और हम लोगों ने उन्हें बाइज्जत कुर्सी पर बैठा लिया था, वे भी पूरे मनोयोग से हम लोगों की बातों में मशगूल हो गए थे, किन्तु उनके धैर्य का बांध उस समय टूट गया जब अरविन्द जी की हाँ में हाँ मिलाते  हुए मनोज जी भी बोल पड़े - 'भाई कुछ भी हो मैं धर्म की निंदा नहीं सुन सकता। धर्म की निंदा सुनना भी धर्म के विरुद्ध आचरण करना है।'
      तभी हमदम जी बोल पड़े थे -'मान्यवर मनोज जी !मैं आप की भावनाओं की कदर करता हूँ किन्तु सच पूछिए तो आप की ही तरह और लोगों की भी मानसिकता बन गई है जिसका लाभ ये सफेद-पोश नेता उठा रहे हैं और भेंड़ बकरियों की तरह जब जी चाहा आप हमको हलाल कर, उसके  खून से राजनीति की चादर का कलेवर बदल ले रहे हैं। धर्म स्वर्ग का रास्ता जरूर प्रशस्त करता है किन्तु सत्य तो यह है कि इस धर्म ने नरक  मचा रखा है, नरक । आज देश में जो कुछ हो रहा है सब धर्म के पीछे ,हिन्दू मुसलमान के दंगे धर्म के पीछे, मंदिर मस्जिद के झगड़े धर्म के पीछे, बार-बार का असमय चुनाव धर्म के पीछे ,देश का बंटवारा हुआ वह भी धर्म के पीछे, जगह-जगह ईशाई मिशनरियों का खुलना और उन्हें प्रश्रय देना यह सब धर्म की ही आड़ में हो रहा है। और सारे राजनीतिज्ञ किसी न किसी को धर्म का  मोहरा बनाकर अपनी राजनीति की रोटी सेंक रहे हैं। मलिन वस्तियों में, आदिवासी क्षेत्रों में आप को जो निःशुल्क सेवा भाव या जरूरत से ज्यादे आर्थिक लाभ किसी धर्म, पंथ, सम्प्रदाय विशेष के माध्यम से मिल रहा है वह धर्म का असली स्वरूप  नहीं है। आज धर्म की स्थिति ठीक हाथी के दांत  जैसी हो गयी है। '
        अब तो उपासना स्थलों को सामरिक स्थल व कुत्सित मनोभावों की भावनाओं को पूर्णता की ओर  अग्रसर करने का  साधन बनाया जा रहा है।
तभी मिश्रा जी बोल पड़े -'आप लोगों ने धर्म की चर्चा  छेड़ कर मुझे भी धर्म संकट में डाल  दिया।  हमको तो लगता है कि धर्म की परिभाषा ही बदल गयी है ,बेटा मनोज !धर्म यह नहीं है ,जो देख रहे हो। धर्म एक दूसरे से जोड़ता है तोड़ता नहीं है। '
हमदम जी ने बीच में ही उनकी  बात को लोकते हुए कहा -'आप एकदम ठीक कह रहे हैं, धर्म हिंसा नहीं सिखाता ,धर्म दूसरे के उपासना स्थल पर अनधिकृत कब्जा कर बर्चस्व दिखाने या वहां तोड़-फोड़ करने या उसे अपवित्र करने का आदेश नहीं देता है, धर्म समभाव सिखाता है ,धर्म एक दूसरे का आदर करना सिखाता है, अहिंसा का दूसरा नाम धर्म है ,और ये बातें सभी धर्मग्रंथों में लिखी हैं चाहे वह नानक का गुरु ग्रंथ हो या पैगंबर का कुरान अथवा हमारे ऋषियों का उपनिषद या फिर यीशू का बाइबिल, सभी अहिंसा के पक्षधर हैं, फिर भी सारे धर्मावलम्बी आपस में लड़ते-झगड़ते रहते हैं, और जिद्द ठान हमको आपको लड़ाते रहते हैं। 
       मिश्रा जी पुनः बोल पड़े -भाई हमदम जी ! यही तो इस देश का दुर्भाग्य है कि प्रत्येक व्यक्ति समीक्षा नहीं करता बल्कि लकीर  का फकीर बना इन नेताओं व पाखंडी धर्मगुरुओं की आवाज पर मरने –कटने को तैयार हो जाता है। '
       'आज धर्म की महिमा का गुणगान करके राजनीतिज्ञ हों या धर्मगुरु या फिर छद्मवेषी धनपशु सब के सब धर्म की आड़ में अपनी-अपनी झोली भर रहे हैं, अपने स्वार्थ की पूर्ति  कर रहे हैं ,या यों कहिये की लंबा-चौड़ा बोर्ड लगाकर मठ  मंदिरों में राजसुख भोग रहे हैं। आये दिन अखबारों में बहुत कुछ अकथ्य घटनाएं प्रकाशित होती रहतीं हैं ,फिर भी धर्मभीरु लोग शिकार होते रहते हैं। आप ने कभी किसी नेता या धर्मगुरु को शर्म के लिए शहीद होते सुना  है ? नहीं, नहीं सुने होंगे, क्योंकि उनका लक्ष्य भावनाओं की चिंगारी से आग का प्राकट्य कर भोली भाली धर्मभीरु जनता को लकड़ी के रूप में प्रयुक्त कर धर्म की भठ्ठी में अपने स्वार्थ की रोटी सेंकना है। इसलिए यह सब कब तक चलता रहेगा कुछ नहीं कहा जा सकता। आप सब ने दीपक को देखा है न ?वह स्वयं जलता है तब दूसरों के लिए प्रकाश की व्यवस्था करता है परन्तु यहां सब कुछ उलटा-पुलटा  है ,एकदम  उलटा।'
 'और फिर हम कहते हैं कि मानव धर्म से बढ़कर भी कोई दूसरा धर्म है क्या ?,जिस दिन मनुष्य मनुष्य की पूजा करने लगे, एक दूसरे का दुःख दर्द समझने लगे उस दिन यह धरती स्वर्ग हो जाय स्वर्ग। रही  धर्म की बात तो धर्म तो सचमुच  बड़ी ऊंची चीज है -'धर्मो रक्षति रक्षितः 'धर्म के वगैर तो हम एक कदम भी नहीं चल सकते, धर्म के अभाव में हम क्या   हमारा पूरा समाज ही बिखर जाएगा। आज हमारे समाज या घर परिवार में जो भी संस्कार या लाज-लिहाज बचा है, सुरक्षित है, वह सिर्फ धर्म के नाते ,इसीलिए कहा  है कि ''यतो धर्मस्ततो जयः ''। क्या विडंबना है हमारे समाज की एकांत कमरे में जब हम अपनी बहन बेटी बुवा के संग होते हैं तो हमारे मन में किसी प्रकार का विकार नहीं आता ,परन्तु वहीं परायी कन्या या कोई महिला होती है तो हम कर्मणा भले ही पाप से वंचित होते हैं किन्तु मनसा और कभी -कभी वाचा पाप तो कर ही बैठते हैं।
धर्म अकेले में भी हमारा मार्ग दर्शन करता है। 'धर्म ही है जिसके कारण मुसलमान भी निकाह करते वक्त दूध का बराव  करते हैं। धर्म ही है जब हम किसी पराई कन्या या बहन से एक मामूली कच्चा धागा हाथ में बंधवा लेते हैं तो उसकी रक्षा में अपना बलिदान तक कर डालते हैं।  अपने बड़े बुजुर्गों का सम्मान करते हैं ये धर्म है ,जिसका नमक खाते हैं उसके प्रति वफादार बने रहने का प्रयत्न करते हैं ये धर्म ही है। धर्म बड़ा विस्तृत है और बड़ा ही कठिन। 'यह कहते - कहते उनकी आँखें छलछला आयीं।  
        यह सुन पाकर हमदम जी ने कहा -'आदमी को इतना भावुक भी नहीं होना चाहिए। आदमी भावुकता में दिल का मरीज हो जाता है ,फिर आप तो हम सबमें सबसे बुजुर्ग हैं ,समाज और दुनिया को काफी निकट से देखे हैं भला आप को हम लोग क्या समझाएं,,,,,.बीच में ही बात काटते हुए मिश्रा जी बोल पड़े -
         हमदम जी !मुझे भी धर्म ने बाँध लिया है समझ नहीं पा  रहा हूँ कि कैसे निकलूँ ,निकल तो क्या पाऊंगा अपने धर्म का निर्वाह कर सकूँ यही बड़ी बात है ,ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि हे नाथ !मुझे ऐसा बल दो की तुम्हारे द्वारा बांधे बंधन के दायित्व का निर्वाह कर सकूँ। 
        कैसा दायित्व मिश्रा जी ?हमदम जी ने आश्चर्य भरे शब्दों में पूछा। 
        मिश्रा जी ने थोड़ा रुक कर कहना शुरू किया -'हमदम जी उन दिनों की बात है जब मैं नयी -नयी नौकरी पाया था। उसी समय गले में फोड़ा से परेशान होकर डाक्टर को दिखाने पटना आ पहुंचा। डाक्टर ने बताया कि रोग अंदर ही अंदर इतना बढ़ गया है कि तत्काल आपरेशन न हुआ तो यह रोग आप के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। और मैं बिना कुछ सोचे बिचारे वहां एडमिट हो गया। 
         हमदम जी ! प्रभु की आज तो कृपा से  योग्य पुत्र के चलते मुझे दुनिया की प्रत्येक सुख सुविधा उपलब्ध है किन्तु उस समय मैं एक अत्यंत सामान्य परिवार का सदस्य था और सर पर जिम्मेदारियों का बहुत बड़ा बोझ था, गृहस्थी एकदम कच्ची थी, बूढ़े माता-पिता और घर में मेरी पत्नी, गोंद में छोटे-छोटे दो अबोध बच्चे ,अस्पताल में सेवा करने वाला कोई नहीं ,पर सच है कि ईश्वर के बड़े लम्बे हाथ हैं। सुना था कि ''विपदा आती है तो उसके पीछे प्रभु की करुणा भी दौड़ी-दौड़ी आती है, सो उसी अस्पताल में एक नर्स जो अभी ट्रेनिंग ले रही थी और  अन्य सभी लड़कियों से भिन्न थी, बोलती थी तो लगता वाणी में मिश्री घुली हुई हो ,,शरीर छूती तो लगता कोई रूई का फाहा तन से छू गया हो और चेहरे की सौम्यता तो सचमुच देव मंदिर की भव्य मूर्ति जैसी। देखते ही कोई भी उसके प्रति श्रद्धाभिभूत हो जाता । लगता जैसे उनका आधा रोग उसे देखते ही दूर हो गया। 
          मुझे आज भी अच्छी तरह से याद है, मैं स्वस्थ हो चला था दो-तीन दिन बाद अस्पताल से छुट्टी होनी थी कि रक्षाबंधन का पावन पर्व आ पड़ा था, प्राय सभी की एक रोगियों के हाथों में राखियां बंधी चमचमा रहीं थीं। कुछ की डाक से आयी थी तो कुछ स्थानीय लोगों की बहनें आकर राखियां बाँध गयीं थी। मैं अपने भाग्य पर मन ही मन सोच रहा था कि कितना बड़ा अभागा हूँ जो मेरी अपनी कोई सहोदर बहन नहीं है ,मेरी अपनी बहन होती तो राखी अवश्य भेजी होती या आज के दिन आकर बाँध गई होती। इसी सोच में डूब उतरा रहा था कि तभी वह मेरे कमरे में अपनी ड्यूटी के समय से वह हाजिर हो गई और रोज की भाँति  सभी मरीजों का हाल-चाल लेती उस दिन सभी को एक-एक लड्डू खिलाती मेरे बेड तक आ पहुंची थी और मेरी सूनी कलाई को देखते ही पूछ बैठी -' क्यों भाई मिश्रा जी !तुम्हारे घर से राखी नहीं आई क्या ? लगता है कहीं डाक विभाग में फँस गई '
         यह सुनकर मेरी आँखे गंगा यमुना हो गईँ ,मैंने कहा -'नहीं सिस्टर मेरी अपनी कोई बहन नहीं है '-और मेरा गला भर आया ,आगे कुछ बोलना चाहकर भी नहीं बोल पाया।   
       तभी उसने कहा –‘बड़े झूठे हो भाई ! अभी –अभी तुमने मुझे सिस्टर कहा है, महीने भर से कहते भी आ रहे हो ,और मैं तुम्हारे सामने ही हूँ फिर भी कह रहे हो कि मेरी कोई बहन नहीं है
      फिर अपनी दाहिनी जेब से रेशमी धागे की राखी और बायीं जेब से रोली की डिब्बी निकाल कर माथे पर लगाते हुए बोल पड़ी -  ‘बढाओ तो कलाई अपनी ,और मैं सचमुच अपनी दाहिनी कलाई बढ़ा दिया था तब उसने रेशमी धागे बांधते हुए मेरे सामने के टेबिल पर रखी पिटारी में से एक लड्डू उठाकर मुंह में ठूंस दी थी।
      मैं किं कर्तव्य विमूढ़ सा बना इतना ही पूछ पाया –‘बहन तुम्हे कौन सा उपहार दूँ ? मैं समझ नहीं पा रहा हूँ।   
         उसने कहा –‘अरे ! अरे ! ये क्या कह रहे हो ? सुना है तुम अध्यापक हो ,तुम्हे भी समझाना पड़ेगा, अरे एक बहन  के लिए भाई के स्वास्थ्य से बढकर और दूसरा उपहार क्या हो सकता है । तुम यहाँ से स्वस्थ होकर अपने घर परिवार में खुशी –खुशी जाओ हमारे लिए इससे बड़ा उपहार क्या होगा ।
        बंधु ! हमदम जी, मैं स्वस्थ होकर वहां से घर चला आया और तीन महीने में तीन बार चेक अप कराने भी वहाँ गया । जब जब गया उससे मिलता रहा किन्तु स्वस्थ होते ही अपनी ग्रहस्थी में उलझ गया । एक वर्ष बाद वही रक्षाबंधन का पावन पर्व फिर से आया तो मैंने अपनी पत्नी से कहा –‘सुनती हो तुम्हारी धर्म की ननद के पास जाना चाह रहा हूँ राखी बंधवाने क्या कह रही हो ?
         पत्नी ने कहा – ‘आती हूँ ’और बगल के कमरे में चली गई, थोड़ी देर बाद लौटी तो उसके लिए सुंदर सी साड़ी और अन्य उपयोगी सामान कढ़ाई किये हुए झोले में रखकर ले आई और बोली कि –‘अभी तो आप की बहन के लिए मैं अपनी तरफ से कुछ भी नहीं दे पा रही हूँ पर जब उन्हें सूरज के मुंडन में बुलाऊँगी तो ऐसा कुछ अवश्य दूंगी जिसे वे जीवन भर याद करेंगी।
        मैं अपनी पत्नी के मनोभावों को सुनकर मन ही मन बड़ा प्रसन्न हुआ। पटना आकर उसके लिए एक चिकन का सूट खरीदा, सोचा पिछले वर्ष खाली हाथ राखी बंधवाया था सो इस बार उसे दोनों उपहार दे दूँगा पर जब मेडिकल हास्टल पहुंचा तो पता चला कि वह ट्रेनिंग छोडकर चली गई।
        उस दिन दुखित होकर निराश मन लिए लौट आया। घर आकर उसके बताये पते पर उसके पिता जी को चिट्ठी भेजा तो उत्तर आया –‘बड़े दुःख के साथ लिखना पड़ रहा है कि आप की बहन कुछ दिनों पूर्व एक एक्सीडेंट में दिवंगत हो गई ।
         मित्र हमदम जी ! उस पत्र से मैं बहुत मर्माहत हुआ ,जब भी राखी का पावन पर्व आता एक बार मुझे रुला जाता, और जब भी किसी गले के रोगी को देखता तो अस्पताल के वे दिन और उसके सेवा भाव याद आकर रुला जाते इस तरह दिन बीतते गये बीतते गये और एक लंबा समय बीत गया, मेरे दोनों बच्चे क्लाश वन अफसर हो गये, जहां–जहां वे स्थानांतरित होकर जाते मुझे भी जाने का अवसर मिलता, उसी क्रम में उस नर्स के गृह जनपद जाने का अवसर आया, उस शहर में पहुँच कर मुझे बेचैनी सी होने लगी, मन में भाव आया उसके घर वालों से मिल लूँ, उसके माता–पिता, भाई–भतीजे कोई तो होंगे जो यह बता पायेंगे कि आखिर उसकी मौत कैसे किस दुर्घटना में हुई, सो पता लगाने उसके घर जा पहुंचा।
         उसके पारिवारिक सदस्य के नाम पर उसका भतीजा मिला, पता चला कि इस दुनिया में उसके माँ बाप भाई अब कोई नहीं रहे।
            उसके भतीजे से मैंने पूछा –‘अच्छा यह बाताओ कि मरियम नाम की तुम्हारी कोई बुआ थी उन्हें जानते हो ?’
     भतीजे ने कहा –‘ हाँ –हाँ जानता हूँ, बुआ हैं तो क्यों नहीं जानूंगा, क्या बात है ? आप कौन हैं ?
     मैंने अपना परिचय न देकर पुनः पूछा –‘तो फिर बताओ कि उनकी मौत कैसे हुई ?
      वह बौखला गया, पूछा –‘आप कौन हैं और क्या कह रहे हैं। जीवित व्यक्ति को मृत बता रहे हैं।
      मैंने सोचा कहीं गलत जगह तो नहीं आ पहुंचा, फिर अचरज भरे स्वर में पूछा –‘तो बताओ न फिर, कि वे कहां हैं। रही बात मेरी तो सिर्फ यह जान लो कि उनके द्वारा अस्पताल में कभी मुझे जीवन दान मिला था।
       तब उसने बताया कि वे पटना में रहती हैं, किन्तु हम लोग अब उन्हें सीमा बुआ के नाम से जानते हैं। उन्होंने हिन्दू धर्म के एक व्यक्ति से प्रेम विवाह कर लिया था इस लिए हम लोग उनसे अब कोई मतलब नहीं रखते। न उनके पास कोई जाता आता है और न उन्हें कोई बुलाता ही है। हम लोग शुद्ध ईशाई ठहरे, उन्होंने एक बार भी इसका ख़याल नहीं किया कि गाड फादर क्या सोचेंगे, अतः प्रभु ईशू की प्रसन्नता के लिए उनसे किसी प्रकार का रिश्ता–नाता नहीं रखते। वैसे यह समझिये की वे हमारे लिए मर चुकी हैं। हम लोगों के लिए क्या एक तरह से वे अपने जीवन में भी मृत ही हैं। अच्छा ही हुआ उनके साथ, जैसी करनी कीं वैसा भोग भी रही हैं। एक दम कुलकलंकिनी निकली, कुलकलंकिनी, दादाजी तो अपने जीते जी नहीं ही बुलाए, मरते-मरते हम लोगों से भी कह गए कि उसे अपने घर में कभी प्रवेश मत देना ।
      मैं सोचने लगा उसने गलत कार्य अवश्य किया पर उसके कृत्य का इतना बड़ा दण्ड, इतनी भारी सजा, यह बात समझ में नहीं आती। हम सबसे पहले इन्शान हैं बाद में हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख ईशाई या और कुछ। सब एक ही अन्न खाते हैं, सबका खून एक ही जैसा लाल है, सबके गर्भाधान से लेकर पैदा  होने तक की प्रक्रिया एक जैसी ही है अतः कैसी जात और कैसा धर्म ? फिर मैंने कहा ‘अरे भाई ! सबसे बड़ा तो मानव धर्म है, मानव का मानव के प्रति प्रेम सौहार्द्र हो, सभी एक दूसरे के धर्म की मर्यादा करें बस यही सबसे बड़ा धर्म है’। और फिर इस चिन्तन के बाद पूछ बैठा –‘अच्छा उनका पता बता सकते हो ?’
      उसने अन्य मनस्क भाव से मानों बला समझकर टालने के उद्देश्य से, पता लिखकर मुझे थमा दिया।
     प्रफुल्लित मन लिए मैं दूसरे सप्ताह उसके दिये हुए पते पर जा पहुंचा, समय की गति ने हम दोनों के सकल–सूरत में आमूल–चूल परिवर्तन कर दिया था, जब मैं ही उसे नहीं पहचान पा रहा था तो भला वह कैसे मुझे पहचान पाती। मैंने काफी कुछ उसे याद दिलाया तो उसके दिमाग में कुछ–कुछ धुंधली सी स्मृति आई। तब उसने कहा -; हाँ हाँ, एक लड़का दवा कराने आया था,’
       फिर रुक कर  बोली –‘उस दो साल की ट्रेनिंग के दौरान न जाने कितने मरीज आये और गए भला कैसे याद रहेगा।’ और चुप लगा गई।
      मैं सोचता रहा कहाँ से अपनी बात प्रारम्भ करूँ ? क्या पूछूँ, क्या कहूँ ? किसी बात का बुरा न मान जाय।
       तभी वह पूछ बैठी –‘कैसे आना हुआ ?’
             मैंने बड़ी हिम्मत से कहा –‘आप के गृह जनपद में इस समय रह रहा हूँ, आप का पता मिल गया था, यहाँ पटना सचिवालय में किसी कार्यवश आया था सोचा आप से भी मिलता चलूँ।
      बातें आगे बढ़ी, बातों के ही दौरान मैंने पूछा –‘अच्छा मरियम यह बताओ कि तुमने ट्रेनिंग भी पूरी नहीं की और अपना घर बसा ली, माँ-बाप सबसे रिश्ता तोड़ ली, आखिर ऐसा क्यों ?  मुझे अच्छी तरह याद है तुम दूसरों को सुझाव देती थी, फिर तुमसे इतनी बड़ी गलती कैसे हो गई।?
     उसने बड़े ही दुखित स्वर में भावुक होकर कहा –‘भैया ! पहले तो आप भूल जाइए कि आप के सामने मरियम खड़ी है, मुझे तो उस नाम और धर्म दोनों से घृणा हो गई है, अब अगर आप पुकारना ही चाहें तो सीमा नाम से मुझे पुकार सकते हैं
फिर थोड़ा रुककर बोली –‘वैसे आप ने जब पूछ ही लिया है तो सुन लीजिये – ‘मैं अपने समाज, माँ – बाप व सम्पूर्ण मायके वालों की दृष्टि में आचरणहीन व कुलकलंकिनी हूँ, पर मेरी मजबूरी को समझने का किसी ने भी प्रयास नहीं किया, सबने यही समझा कि आज के दौर में प्यार जो फैशन का रूप ले लिया है अंतरजातीय, अंतर्धार्मिक विवाह करने की परम्परा बन गई है अपने देश में, शायद मैंने भी वैसे ही लव मैरेज कर लिया है। इसलिए मैं सभी की निगाहों से गिर गई। माँ बाप रहते हुए भी अनाथों की तरह हो गई। मेरे सुख दुःख में कोई भी खुशी व्यक्त करने वाला या आंसू बहाने वाला नहीं रहा।
      एक गहरी सांस लेते हुए बोली ‘भैया ! आपने तो अस्पताल के दिनों में मुझे अत्यंत निकट से देखा था कि चरित्र के मामले में कितनी कमजोर या मजबूत थी ? मैं कितनी सुंदर या असुन्दर थी ? हाँ यह जरूर कहूँगी कि मैंने अच्छा किया या बुरा, यह तो मैं नहीं जानती पर यह तन अर्पित हुआ तो सिर्फ को ही। चाहती तो मैं भी अपनी नजरों में गिर कर, अपने माँ बाप की दृष्टि में अच्छी बनी रहती। और जीवन में कई एक डाक्टरों, वार्ड ब्वायों या फिर दादा किस्म के लोगों को संतुष्ट कर पातिव्रत्य की झूठी चादर ओढ़कर अपने चेहरे पर बेहया हँसी व मुस्कान बनाये रहती, किन्तु मैंने ऐसा कुछ भी नहीं किया जिसका दण्ड भोग रही हूँ, किन्तु मेरा अंतर्मन मुझे कभी नहीं कोसता, अपने मन की आँखों में आज भी गिरी नहीं हूँ, मेरा चरित्र उस कंचन की तरह है जो जितना ही आग की दहकती भट्ठी में तपता है निखरता जाता है।
       आप तो जानते हैं कि आज की  दुनिया में नर्सों को लोग एक अलग दृष्टि से ही देखते हैं मानों वह औरत न होकर कोई खिलौना हो, जिससे जो चाहे जब चाहे खेल ले, उसी क्रम में मेरे ट्रेनिंग पीरियड में कई एक लोग उसी गंदी भावना से मेरे पीछे पड़े हुए थे और मेरा जीना मुहाल सा हो गया था एक–एक दिन प्रभु की कृपा से इज्जत बचाते हुए बीत रहे थे कि उन्हीं लोगों में छात्रसंघ के नेता जो दबंग किस्म के थे उन्होंने मेरे सामने एक प्रस्ताव रखा, मैं सोच नहीं पा रही थी कि किसे क्या कहूँ, एकाध सहेलियों से पूछी तो उन सब ने कहा कि कर दे समर्पण, नेता सब पर नहीं मरते, तेरा अस्पताल में रुतवा रहेगा रुतवा, पर मेरा अन्तःकरण स्वीकार नहीं किया, सोची घर वालों से कहूँ, पर उसका भी कोई हल न निकलना था क्यों कि पिताजी का कहना था कि चाहे जैसे भी ट्रेनिंग पूरी करनी है, इस लिए मैंने अपने विवेक से निर्भीकता पूर्वक उस छात्र नेता से प्रश्न किया –‘क्या आप मुझे वासनापूर्ति का साधन मानते हैं, या और कुछ ?
       वे भड़क गए, बोले –‘कहना क्या चाहती हो ?’
            मैंने कहा –‘मैं आप से कह भी क्या सकती हूँ ,किन्तु जिस वस्तु की आप अपेक्षा कर रहे हैं वह तो सिर्फ अपनी पत्नी से ही उम्मीद करनी चाहिए और मैं आप की पत्नी हूँ नहीं ,और न होने वाली हूँ
      बोले –‘तब ?’
      मैंने कहा –‘तब क्या, यदि आप अपने शरीर की भूख मिटाना ही चाह रहे हैं तो चलिए एकांत स्थल या जंगल में पहले मेरा गला दबा कर ह्त्या कर दीजिए फिर अपनी भूख मिटा लीजिएगा, क्योंकि मैं जानती हूँ कि आप से द्रोह कर के मैं बच नहीं सकती या फिर दूसरा विकल्प यह है कि इस विद्या मंदिर की अधिष्ठात्रि देवी सरस्वती की सौगन्ध खाकर कहिये कि ‘आजन्म एक जीवन साथी की तरह मुझे सम्मानित जीवन देंगे, और मेरे गर्भ से पैदा हुई संतान को पिता की जगह अपना नाम फिर मैं तैयार हूँ’                                    
        भैया !इस प्रस्ताव को रखने के बाद मैं जान रही थी कि आज मेरे जीवन का अंतिम दिन है, क्यों कि वे खूंखार किस्म के थे, किन्तु परिणाम ठीक विपरीत निकला
       उन्होंने मेरी बात सुनने के बाद कहा कि –‘मरियम ! तुमने तो मेरी आत्मा को हिला के रख दिया, आज मैं तुम्हारे सामने हार गया हूँ तुम्हारे चरित्र के पर्वत ने तो मेरे अंदर की नदी की धार को ही बदल दिया इस लिए मेरे जीवन की सच्चाई को सुनो– मैं विवाहित हूँ, मेरी पत्नी गाँव में रहती है, और मैं यदुवंशी हूँ तुम यदि अपना धर्म बदल कर मेरे साथ रहना चाहो तो मैं अपने कुल आराध्य भगवान कृष्ण की सौगंध खाकर कहता हूँ कि आजन्म तुम्हें पत्नी की तरह रक्खूँगा, खाते पीते घर का हूँ, कोई कमी नहीं होने दूँगा, पर शर्त यह है कि तुम्हें नर्स की ट्रेनिंग से विमुख होना पड़ेगा, और भविष्य में भी नौकरी नहीं करोगी, क्योंकि औरत घर की इज्जत होती है इसी लिए उसके लिए सीमा बनायी गई है, शायद तुम भी घर में होती तो तुम्हारे सामने यह प्रस्ताव न रख पाता, इसलिए मरियम से सीमा बन जाओ और बचन दो कि हमारे हिन्दू धर्म के देवी देवताओं का आदर करोगी, अन्यथा मैं तुम्हारे साथ कुछ भी कर सकता हूँ और तुम मेरा कुछ भी बिगाड़ नहीं सकोगी, न ही मुझसे अपना चरित्र बचा सकोगी’
     तब मैंने कहा –‘क्या ऐसा कर लेने मात्र से फिर आप का दिल किसी और नर्स या पर नारी पर नहीं उतरेगा, या उतरेगा तो उसे भी ऐसा ही आश्वासन देंगे ?
उन्होंने कहा – तुम्हें इस प्रकार मुझसे प्रश्न करते भय नहीं लग रहा ?
मैंने कहा – ‘कैसा भय ? भय भी कहीं अपने पति से लगता है ?, यदि आप ने स्वीकारा तो भी पति  हुए, और कहीं अपनी भूख मिटाकर त्याग दिए तो भी, क्योंकि वही मेरी जिन्दगी का आखरी दिन होगा भारतीय नारी तो जीवन में एक बार ही किसी का वरण करती है चाहे इच्छा से या अनिच्छा से और वही उसका पति होता है, ईशाई धर्म में पैदा हुई तो क्या हुआ, हूँ तो भारतीय
     भैया, इतना सुनने के बाद वे मुझे खींचकर गले लगा लिए और बोले –‘यह आश्वासन नहीं एक यदुवंशी का वचन है जो सिर्फ तुम्हें दे रहा हूँ, और हाँ  अब फिर किसी अन्य नारी पर मेरा दिल न उतरे इसका भरपूर प्रयास करूंगा
तब मैंने कहा – ‘तो फिर एक वचन और  दीजिए की अपनी व्याहता पत्नी को  जो मेरी बड़ी बहन हुईं,  मेरे कारण भूल कर भी कोई कष्ट नहीं देंगे और न ही उनका अपमान करेंगे ?
      उन्होंने कहा –‘यह तुम कह रही हो, एक नारी होकर ?
      मैंने कहा- ‘हाँ, मैं कह रही हूँइसलिए कि जान बूझ कर एक नारी का अधिकार बांटने जा रही  हूँ, वे तो मेरी मजबूरी को नहीं जानती पर आप तो जान रहे हैं न ? और मैं भी उनके विषय में जानने के बाद अपना निर्णय आप को दे रही हूँ
     यह सब सुनने के बाद उन्होंने वचन दिया कि ऐसा ही करूँगा, दूसरे ही दिन संयोग से आश्विन नवरात्र का प्रथम दिन था ट्रेनिंग छुडवाकर देवी मंदिर ले गए और माँ भगवती के सामने सिंदूर पहना दिए
     भैय्या, मैंने नर्सों की इस अकथ्य मजबूरी को बताने का दुस्साहस किया, उससे नर्स जाति पर एक प्रश्न चिन्ह सा लग जा रहा हैबहुत सी मेरी बहनें जो इस बाने से जुटी हैं वे मुझे गाली भी देंगी किन्तु यह कटु सत्य है, इसका यह भी मतलब नहीं कि वे सब पथभ्रष्ट होती हैं, मैं तो सिर्फ यह कहना चाह रही थी कि कुछ तो उस माहौल में अपने को न चाहते हुए भी ढाल लेती हैं और कुछ के ऊपर कोई असर नहीं पड़ताबत्तीस दांतों के बीच रहकर भी अपने को सुरक्षित रख लेती हैं जीभ की तरह किन्तु यह जो समाज है, उसकी अपनी अलग दृष्टि है जिसकी वजह से उसे अच्छे भी बुरे दिखाई देते हैं हाँ, मैं यह भी कहना चाहूँगी कि जो बहनें इस सेवा में लगी हुई हैं वे बहुत महान हैं  जो अपने को आरोपित महसूस करते हुए भी सेवारत हैं अन्यथा यह सबके ऊपर हंसने वाला समाज कब का रोगी होकर समाप्त हो गया होता
     और भैया इस तरह उनके साथ दाम्पत्य धर्म का निर्वाह करते हुए पांच संताने हुईं तीन बेटियाँ और दो बेटे, अभी कच्ची गृहस्थी ही थी कि उनकी कीर्ति और वकालत का लोहा मानने वाले कुछ गुंडे, एक बहुत बड़े अपराधी को फांसी की सजा दिलवाने के कारण उनकी ह्त्या कर दिएवे अपराधी उन्हें पैसों से खरीदना चाहते थे, किन्तु वे एक असहाय नारी की ओर से वकालत कर उसके पति के हत्यारे को फांसी पर लटकवा दिए थेपरिणामत: उस नामी गुंडे का लड़का जो स्वत: भी नामी गुंडा है उनकी ह्त्या करवा दिया जिसकी ह्त्या उसके बाप ने की थी , उसका दोष सिर्फ इतना था कि उसने अपनी सुंदर पत्नी का चरित्र लुटने से बचाया थायानी उस गुंडे का प्रतिरोध किया था
      इस तरह भैया, आज अठारह साल से धर्म के बीच फंसी हुई हूँ, मायके वाले पहले ही मुझे  त्याग दिये थे उनके जीते जी, आप को पहले ही बता चुकी हूँ
     उनके निधन के बाद ससुराल वाले भी यह कहकर त्याग दिये कि तुम्हें ब्याह कर थोड़े लाये थे ? फिर तुम तो ईशाई थी, अब अपने बच्चों के साथ जरो या  मरो, हम लोग हिन्दू हैं, हम लोगों से कोई मतलब नहीं
     भाई हमदम जी !उस दिन मैं पटना से लौटने की जल्दी में था और उसकी बातों को सुनकर बोझिल मन लिए चुप चाप लौट आया था, यह कहकर कि - ‘अच्छा बहन मैं तुमसे जल्द ही पुन: मिलूंगाकिन्तु मन कई  दिनों से इस उहापोह में है कि उसने तो अस्पताल के दिनों में अपने धर्म का निर्वाह किया और धर्म के धागे से मुझे बाँध भी लिया, पर मैं उसके लिए क्या करूं ? इसी धर्म संकट में पड़ा हूँ
कल रात पत्नी ने मेरी अन्तर्व्यथा को दूर करने के लिए सुझाव दिया कि –‘ संभव हो तो उनके बेटे बेटियों के भविष्य को संवारने में सहयोग कीजिए ‘मुझे उसकी बात जंच गई हैमैंने दृढ संकल्प कर लिया है कि अपने भ्रातित्व धर्म का अवश्य निर्वाह करूंगा’
तभी नौकर आकर बोल गया – ‘सर ! माँ  जी भोजन करने के लिए बुला रही हैं, थाली लगी हुई है,  वे उठ खड़े हुए और उनके साथ सभी  लोग उठ कर खड़े हो गये तथा  बोल पड़े – ‘यही संसार है मिश्राजी क्या करिएगा, फिल हाल जाइए भोजन कर लीजिए’

शनिवार, जून 10, 2017


उलट   गई  संवेदना  ,पलट  गया   व्यवहार। 
मात  पिता लगने लगे ,अब बासी  अखबार।।

राजा  वेश्या  अग्नि  यम ,बच्चा याचक चोर। 
पर  पीड़ा  जाने  नहीं ,नहीं  आंख  की   लोर।।

सत्ता  पाने  के   लिए, सब    पागल    बेचैन। 
मिर्चा  को  गुड़  बोलते ,दिन  को  कहते रैन।


2016 मैं प्रकाशित पुस्तक

 



बुधवार, जून 17, 2015

वह जा न सका[कहानी ] :डा उमा शंकर चतुर्वेदी "कंचन"


      समाचार –पत्र पढने के बाद एकाएक श्याम की विचारश्रृंखला जाने कैसे वर्षों पीछे चली गयी और याद आया उस दिन काफी देर की प्रतीक्षा के बाद अपने निश्चित समय से डेढ़ घंटा लेट गाड़ी आयी थी |
  और गाड़ी में भीड़ इस कदर थी कि पाँव रखना दूभर हो रहा था | जब कि उसे लखनऊ जाना अत्यावश्यक था | जेठ महीने की कड़ाके की धूप और लू अपनी चरम सीमा पर थी|आये दिन दो –चार ख़बरें अखबार में पढ़ने को मिलती थीं कि लू से अमुक जगह इतने मरे |
  भीड़ की हालत यह  थी कि लोग ट्रेन की छतों पर भी बैठे थे | उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे | तभी गाड़ी प्लेटफार्म से गार्ड के भिसिल के साथ सरकने लगी और अंततः बाध्य होकर एक डिब्बे के दरवाजे पर डंडा पकड़कर पांवदान पर खड़ा गया था |
  अगला स्टेशन आया तो उसने सोचा कुछ लोग जरूर उतरेंगे और उसे जगह मिल जायेगी , पर यहाँ और भीड़ दीखी | परिणामत :उसे ज्यों का त्यों अपने स्थान से चिपक जाना हुआ |
  लेकिन अब उसका हाथ भी दर्द से भर गया था | एक हाथ से बैग और दूसरे से डंडा थामे वह  किंकर्तव्य विमूढ़ सा बना रहा और पसीने से फिसल रहे हाथ को रह –रहकर भींचता रहा |
   गाड़ी छुक –छुक –छुक करती चली जा रही थी | सहसा एक मधुर आवाज कानों से टकरायी और उसने गर्दन घुमाकर देखा तो एक लड़की खिड़की से बाहर हाथ किये उसके बैग को थामें कह यही थी –‘भाईसाहब बैग मुझे दे दीजिये |’
   तब वह प्रतिकार न कर सका | बैग उसने दे दिया और  अच्छी तरह खड़े होकर कुछ सोचने पर मजबूर हो गया | इस बालिका का हृदय तो देखो , गाड़ी में और लोग भी तो हैं | यह बात और किसी के दिमाग में क्यों नहीं आयी ? शायद आयी होगी ,पर सोचते – सोचते अगला स्टेशन आ गया और गाड़ी धीमी होते –होते प्लेटफार्म पर जा लगी |
   उस स्टेशन पर कुछ लोग उतरे | डिब्बे में थोड़ी जगह हो गयी और उसको भी बैठने के लिए  सीट मिल गयी | और उसने ज़रा चारों ओर नजर दौड़ाई तो वही लड़की बगल में बैग रखकर एक हाथ में बन्दूक लिए अपने पास ही बैठी दीखी |
   उसके हाथ में बन्दूक देखकर यह समझते देर न लगी कि बन्दूक इसके किसी अभिभावक की है और यह किसी सम्पन्न घराने की है | फिर बगल में बैठे व्यक्ति की तरफ मुख़ातिब हो उसने अंदाजन पूछा था – ‘यह कन्या आप की ही है ?’
  ‘जी हाँ !’उस व्यक्ति ने मुस्कराते हुए कहा था |
   ‘बहुत भली है |’ उसने धीरे से कहा तो वह व्यक्ति ज़रा – सा मुस्कराया |
    बैठने को जगह मिल गयी थी , , पर गर्मी के कारण भीषण उमस थी और ऊपर से पसीने की दुर्गन्ध ! जी मिचलाने लगा उसका |
   कुछ देर बाद गाड़ी स्टेशन से खुली तो जैसे लोंगो को सांस मिली | उसने अपनी व्याकुलता पर काबू पाते हुए सहज भाव से उसी व्यक्ति से पुन :पूछा – ‘कहाँ तक जाना है आप को ? ’
  ‘लखनऊ ,आप को ?’
  ‘मुझे भी एक स्टेशन पहले तक जाना है |’
  चुनाव के दौरे में तो नहीं जा रहे आप ? बुरा न मानियेगा ,इस वेश - भूषा को देखकर ..... लड़की के पिता  ने हँसते हुए पूछा |
  ‘नहीं –नहीं .....इसमें बुरा मानने की क्या बात है | लेकिन मैं चुनाव के दौरे में नहीं जा रहा हूँ | वैसे आप के क्षेत्र से कौन खड़ा है ? ’
  ‘कांग्रेस सीट से एक लड़का खड़ा है , उसी का जोर – शोर है | नयी उम्र का है | दिनेश राय नाम है उसका |’
 ‘दिनेश राय ? क्या पतले छरहरे कद का तो नहीं है ? छोटी छोटी मूंछे रखता है , माथे पर चोट का निशाँ है ? ’
  ‘हाँ बिल्कुल सही , आपका अनुमान सच है | कैसे उसे आप जानते हैं ? ’
तब हँसते हुए श्याम ने कहा था –‘वह मेरा क्लाशफेलो रह चुका है | मेरे साथ ही उसने राजनीति से एम् .ए . किया था हिन्दू विश्व विद्यालय से | वैसे है तो कर्मठ और होनहार भला लड़का ! अप का क्या ख्याल है ? ’
  ‘हाँ , होनहार है यह तो मानूंगा | समाज - सेवा की भावना उसमें कूट –कूट कर भारी है | ग़रीबों के लिए तो वह मानों भगवान् ही है| अच्छा लड़का है और उसका व्यक्तित्व भी है , जीत जाएगा |’
  बातों –बातों में ही अगला स्टेशन आ गया | यहाँ गाड़ी देर तक रुकती थी | गाड़ी रुकी तो पिता उतरकर प्लेटफार्म पर चाय पीने चले गये |
  जलपान का समय हो चला था सो श्याम सोच रहा था कि क्या किया जाय | तभी खिड़की के सामने फलवाला ठेला लिए आ गया और उसने बिना विचारे आधे दर्जन केला खरीद लिए और अपनी सीट पर आ बैठा और धीरे से लड़की के मुख की तरफ देखकर बोला –‘लो खाओ |’
लड़की ने कुछ शर्माते हुए कहा –‘नहीं ,आप खाइये | मुझे भूख नहीं है |’
  ‘इसमें भूख की क्या बात है ? इससे पेट थोड़े ही भरता है | लो खाओ |’और फिर एक केला तोडकर उसके आगे किया |
  फिर वे दोनों साथ –साथ छिलके उतारकर खाने लगे |तब श्याम ने सरलता से पूछा –‘तुम्हारा नाम क्या है मुन्नी ?’
  ‘शालिनी |’
  ‘और पिताजी का ?’
  ‘ठाकुर केसरी सिंह ’
  ‘वाह ! नाम तो बड़ा सुन्दर है |पढती हो न ?’
 ‘जी –हाँ , आठवीं कक्षा में |’
  वह केला ख़त्म हो गया तो श्याम ने दूसरा उठाते हुए कहा –‘लो ,और लो |‘
  लड़की ने कहा –‘ नहीं, अब नहीं |’
  ‘यह नहीं होगा || तीं मैं खाया हूँ ,तीं तुम भी खाओ |’
  और उसके हाथों में दूसरा केला दे दिया \ वह हंसती हुई खाने लगी तो श्याम ने भी हँसते हुए पूछना शुरू किया –‘ बन्दूक चला लेती हो ?’
  लड़की ने हँसकर ही कहा –‘नहीं ,पिताजी चलाते हैं , मुझे नहीं आता बन्दूक चलाना |’
  ‘अच्छा , पिताजी तुम्हारे करते क्या हैं ? नौकरी ?’
 नहीं ,शहर से कुछ दूर पर खेती है ,सो वहीं खेती कराते हैं |’
   इतने में शालिनी के पिता  आ गये थे और इस तरह दोनों को बातें करते देख हंसने लगे थे |
   अगले स्टेशन पर श्याम जब उतरने लगा तो शालिनी सीट से उठकर खडी हो गयी और गोरे –गोरे  दोनों हाथों की हथेलियों को जोड़कर हौले से बोली – ‘ नमस्कार !’
  श्याम उसकी मुद्रा को देखकर विह्वल हुआ तो पिता ने मुस्कराकर कहा –‘इसकी की ही सारी सीख है|भाई साहब , उसी की सारी छाप पड़ी है इस पर |’और फिर ट्रेन आगे बढ़ गई |
 और फिर दूसरा दृश्य आँखों के सामने आ गया –
  सालों गुजर गये  | ठीक से याद भी न रहा कि अचानक एक दिन कवी सम्मेलन में एक लड़की पर नजर रुकी , रंग उसका तनिक सांवला था ,पर मुख देखने पर लग रहा था , सुन्दरी है | असल में उसकी आँखें ऎसी थी न , सरल –सरल और लजीली –लजीली | और तस्वीरों वाली मछली सी उन आँखों से उम्र का अंदाजा भी सोलह सत्रह ही मिल रहा था | सो वह लड़की सामने आ खड़ी हुई और धीरे से लजाती हुई बोली –‘नमस्ते भाई साहब!’
  तब श्याम ने नमस्ते का उत्तर देकर उसके मुख –मंडल पर अपनी नजर गड़ा दी थी , जिसमें प्रश्नवाचक चिन्ह झाँक रहा था मानों वह पूछ रहा हो –‘तुम हो कौन ?’
 उसे चुप देख लड़की ने पूछा था –‘भाई साहब ! आपने मुझे पहचाना नहीं ? ’
  श्याम ने अचकचा कर कहा था –‘ नहीं , तुम्हारा नाम क्या है ? ’
  ‘शालिनी |’ उस सौम्य मुख वाली लड़की ने धीरे से उत्तर दिया था |   ‘ओ हो ,! शालिनी तुम ? अरे ,तुम इतनी लम्बी हो गयी ? मैं तो पहचान ही नहीं पाया|’
  तब शालिनी ने मुस्कराकर सिर नीचे कर लिया था और प्रसंग बदलते हुए पूछा था – ‘ आप भी कविता सुनायेंगे न ? ’
  और श्याम ने हँसते –हँसते ही कहा था – ‘हाँ , सुनाऊंगा |’
  और शालिनी सखियों की ओर भाग गयी थी |
   ......सम्मेलन प्रारम्भ हुआ | कई लोंगो के कविता सुनाने के बाद संचालक ने श्याम का नाम पुकारा |
  इस तरह कविताओं के कई दौर चले और प्रत्येक बार श्याम की कवितायें सुनकर लोगों ने तालियाँ पीती और वाह –वाह की | सम्मेलन समाप्त होने पर श्याम स्टेज से उतरा ही था कि शालिनी अपने पिटा को साथ लिए सामने आ खडी हुई थी और बाप –बेटी ने मिलकर उसकी तारीफों के पुल बाँध दिए थे |
   तब श्याम  मन ही मन खुश होता धीरे –धीरे मुस्कराता रहा | अपनी तारीफ भला किसे अच्छी नहीं लगती |
   ‘ अब कहाँ जायेंगे ?’शालिनी के पिटा ने पूछा |
   उत्तर में श्याम ने कहा था – ‘बस ,आज रात तो यहीं लाज में व्यवस्था हो गई है ठहरने की सो आराम करना है फिर कल सुबह की ट्रेन से गाँव चले जाना है |’
   यह सुनकर पिता ने स्नेह भरे शब्दों में कहा था –‘आप गाँव जायं या शहर ,इसमें हमें कोई सरोकार नहीं , परन्तु कल का भोजन मेरे यहाँ करके ही अप यहाँ से प्रस्थान करेंगे |’
   ‘ऎसी भी क्या बात है , फिर कभी आऊंगा तो कर लूँगा आप के यहाँ भोजन |’
   ‘ नहीं , यह सब मैं नहीं जानता वैसे तो आप जाने कितनी बार इस शहर में आये और चले गए होंगे ,वह तो जानें किस संयोग से आज भेंट हो गई , तो अब आप लाख बहाने करें ,पर आज मैं छोड़ने वाला नहीं |’
   अंत में बाध्य होकर श्याम ने स्वीकृति दे दी थी | दूसरे दिन श्याम जब शालिनी के पिता  के साथ भोजन करने बैठा था तो शालिनी ही दोनों थालियाँ लेकर आई थी |
   और फिर दोनों लोग मौन ही भोजन करने लगे थे | पेट भर गया तो दोनों ने हाथ रोक दिये | जब श्याम ने दृष्टि ऊपर उठाई तो देखा शालिनी कोने में खडी मुस्करा रही थी | आँखों में जैसे एक असीम परितृप्ति का भाव चमक रहा था |
   उस दिन श्याम शाम की ही गाड़ी से घर को चल दिया था | दरवाजे तक शालिनी और उसकी माँ विदा देने आयी थीं और स्टेशन तक पिता | और तीनों ने बार – बार यही कहा था कि फिर दर्शन दीजियेगा | और श्याम भाव विह्वल हो गाड़ी में बैठा निरंतर उन्हीं लोगों की बात सोचता चला आया था |
   और फिर तीसरा दृश्य दीखा –
   शालिनी कैसे खुश – खुशखे जा रही थी –‘भैया ,जब आप के आने का कार्ड मिला तो हम सबकी खुशी का ठिकाना न रहा | मैं अपनी सब सहेलियों से कह आयी थी कि –कवि  भैया आने वाले हैं | तुम लोग भी आना उनकी कविता सुनने |
  ठाकुर साहब श्याम को लेने ठीक समय से स्टेशन पहुँच गए थे और जब ठाकुर साहब के साथ घर पहुंचा था तो वही सलोना मुखड़ा इतने अरसे बाद एक बार फिर देखने को मिला था | 
   भोजन के पश्चात जब आराम कर रहा था तो उसने कैसे मीठे – मीठे स्वर में आकर पूछा था – रिकार्ड लगा दूँ भैया ?,बैजू बावरा का नया रिकार्ड खरीदा है |’
  तब श्याम ने स्वीकृति में सिर हिला दिया था और रेकार्ड  बजने लगा था –
   ‘आश निराश के दो रंगों से
   दुनिया तूने ....
   और जब वह रेकार्ड लगाकर जाने लगी तो श्याम ने उसे पुकार कर रोक लिया था और पूछा था – ‘ यहाँ पड़ोस में कोई सोहन सिंह रहते हैं ? ’    
  उसने बताया था – ‘हाँ रहते तो हैं|’
  ‘क्या करते हैं ?’श्याम ने गंभीरता से पूछा था तो पता चला कि यहाँ  पोस्ट आफिस में हेड क्लर्क हैं | 
  ‘उनकी सन्तान भी है कोई ?’
हाँ है तो | लड़की है एक , क्यों क्या बात है ?’
  तब श्याम ने कहा था ‘–अरी पगली ! बात है तभी तो पूछ रहा हूँ |’
  ‘तो बताइये न क्या बात है ? , लड़का तो उन्हें  है नहीं , बस एक लड़की ही है ,माया नाम है उसका |’
  ‘ तुम उसे अच्छी तरह जानती हो ?’
   ‘हाँ - हाँ ,खूब अच्छी तरह जानती हूँ | बताइये तो सही क्या बात है ‘वह तो मेरी सहेली है|’
   तब श्याम ने बतलाया था कि –‘ मेरे मित्र से उसकी शादी ठहरी है सो उसी मित्र के कहने पर देखने आ गया हूँ |वह तो तुम्हारी सहेली ही है , किसी बहाने बुलाओ न !’और शालिनी कमरे से बाहर हो गयी थी |
  फिर एक घंटा पीछे चार –पाँच सहेलियों के संग वह लौट आयी थी |उस समय श्याम किन्हीं गीतों की पंक्तियाँ गुनगुना रहा था |और फिर उसने बारी –बारी से सबका श्याम से परिचय कराया था और माया का परिचय देते समय थोड़ा – सा मुस्करा दी थी |
  तब श्याम ने पलकों को झपका कर माया को देखा था | माया का गेंहुआ रंग जवानी की भठ्ठी में तपकर मानों कुंदन बन गया था |  
  फिर परिचय के बाद उन सबों के आग्रह पर उसने एक कविता भी सुनाई थी |
  माया की शादी कहीं श्याम के गाँव में ठीक हो गयी | बारात गई और शादी भी हो गई , पर  किसी कारण वश श्याम मित्र की बारात में सम्मिलित न हो सका | और ठीक एक माह बाद डाकिया एक सुनहला कार्ड दे गया था | यह शालिनी की शादी का निमन्त्रण –पत्र  था |     
शादी पचीस तारीख को होनी थी | सो वहां जाने के लिए वह उसी दिन से तैयारियाँ करने लगा था | बाजार जाकर बनारसी साड़ी और जाने क्या –क्या सिंगार के सामान बहन को उपहार देने को ले आया था | पर दुर्भाग्यवश उस बार भी वह  न जा सका | अचानक चौबीस तारीख को ही भोर में उसे तार मिला और वह पटना चला गया | सोचा था ,किसी  न किसी तरह दूसरे दिन शालिनी के गाँव पँहुच जाऊँगा परन्तु हाय,सोचा हुआ न हुआ |
  सहसा मस्तिष्क को जैसे झटका लगा और फिर चौथा दृश्य दीखा | आज से केवल पाँच  दिन पहले का |
   आफिस में छुट्टी थी ओ वह घर की सफाई में लगा था | आलमारी में किताबों को करीने से सजा हा था कि नीचे ए सांकल खड़खड़ा उठी | सोचने लगा ,दूधवाला आया होगा | पर यह क्या ! देखा कि सामने एक  नारी मूर्ति  खड़ी है और उसके मुँह से एकाएक निकल गया –‘अरे ! शालो तुम !’
   ‘हाँ , भैया मैं |’और फिर वह चरण छूने को झुकी ही थी कि ह्यम ने बीच में ही दोनों हाथ पकड़ कर उस उठा लिया था |
  फिर धीरे –धीरे बातों  के जरिये मालूम हुआ था कि अपने पति के साथ वह यहीं नरहरपुरा में रह रही है |
   और जब यह पूछा कि कैसे मेरा पता तुम्हें मालुम हुआ तो शालिनी ने बताया था –‘दस पन्द्रह दिन पहले एक पत्रिका में आप की एक कहानी अचानक पढ़ने को मिल गयी थी | उसमें पता भी छपा था | उसी को याद करती चली आयी |
   तब श्याम ने पुन : पूछा था – ‘शालिनी अज तुम उदास सी क्यों हो,क्या बात है ? तवीयत ठीक है न ?  और हाँ तुम्हारे श्रीमानजी कहाँ है ,अकेली आयी हो क्या ?’
   पलभर में ही तब शालिनी की दोनों आँखें आंसुओं से पुरनम हो आयीं  और  रुँधे गले से वह कहने लगी –‘उनको पता चलता तो शायद वे मुझे आने भी न देते | मई तो जनम  की ही अभागिन ठहरी |जन्मते ही भाई को कहा गई और विवाह के ही साल पिटा जी एक्सीडेंट में चल बसे | उसी दुःख में माँ भी चार माह पीछे दुनिया छोड़ गयी | और अब मैं  हूँ जो इनके लिए सिर का बोझ बनी हुई हूँ | दिन - रात मेरे पिटा के लिए कहते रहते हैं कि –‘साला मरते समय प्रापर्टी भी मेरे नाम नहीं कर गया | मुकदमा लड़ने को छोड़ गया पट्टीदारों से |’
   तब श्याम ने समझाया था – ‘शालिनी ! आजकल सभी लड़केवालों का यही हाल है | पैसों के भूखे हैं सब , उनके सामने मानवता नाम की कोई चीज है ही नहीं | जो कुछ है बस पैसा है , पैसे के लिए वे सब कुछ भी कर सकते हैं | लेकिन तुम इन सब छोटी – छोटी बातों की चिंता करोगी तो कैसे चलेगा ? इन्हीं चिंताओं में तुम अपनी शरीर
घुला बैठी हो |’ 
   भैय्या ,मैं क्या कहूँ ,आप ने तो उन्हें कभी देखा नहीं है | कहूँगी तो शायद विशवास भी नहीं करेंगे ,और पति हैं न , उनकी निंदा भी कैसे करूं ?’
  ‘ निन्दा का सवाल नहीं है शालो ! सवाल हकीकत का है | जो सच है उसे कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए |संकोच मत करो ,कहो ,सही –सही बात क्या है ,जो सच है उसे बताओ |’
  तब रुँधे गले से ही सिसकियों के बीच शालिनी धीरे –धीरे कहने लगी – ‘वहीं बैंक में उनके साथ कोई एक औरत है , जो स्टेनो का काम करती है | सो उसके साथ रात गये तक घूमते रहते हैं | पता नहीं उस कलमुंही के भाई – बाप भी कैसे हैं .जो कुछ  कहते – सुनते नहीं | और मैं ज़रा सा भी कुछ कहूँ तो तुरंत डांट पड़ जाती है |’
  और क्या कहूँ ,ये सब तो उनकी पुरानी आदत है | शादी के पहले पिताजी ने न कुछ देखा न सुना | लड़का सर्विस में है ,बस इसी आधार पर गाय की तरह लाकर  पगहा पकड़ा दिया और अब हाल यह है कि हर   रात शराब पी के आयेंगे और   गंदी –गंदी गालियों का टेप खोल देंगे | जरा – सा भी कुछ  बोलूँ कि .... और   वह फिर सिसकियाँ भरने लगी |
  तब श्याम ने कहा था –‘रोओ नहीं शालो ! रोओ नहीं ,मेरा कलेजा निकला आ रहा है,  तुम्हें आज से पहले कभी भी रोते नहीं देखा | फिर आज कैसे देख सकता हूँ | चुप हो जाओ , घबड़ाओ नहीं | मैं चलूँगा तुम्हारे घर और उनसे बातें करूंगा | क्या माँ – बाप मर  गये तो शालो अनाथ हो गयी  ? उसको पूछने वाला कोई नहीं है ? तुम अपने को अनाथ न समझना | अभी मैं ज़िंदा हूँ , जिसे तुमने एक बार भाई कहा है और उसी रिश्ते को लेकर राखी भी भेजी है | ’
  और फिर दोनों भाव विह्वल होकर रो पड़े थे | फिर उस दिन श्याम ने काफी समझाया था और तीसरे दिन मंगलवार की शाम को शालिनी के घर आने का वचन भी दिया था | तब इस आश्वासन को पाकर वह बहुत हल्की -सी होकर अपने घर को लौट गयी थी |
  पर जाने किस संयोग से उसी दिन एक आदमी आ गया और रात की गाड़ी से उसे साथ  लेकर वह दिल्ली चला गया था |
   कार्यक्रम कुछ इस तरह था कि मंगलवार वहीं बीत गया |बुधवार को वापसी के लिए श्याम ने रात की ट्रेन पकड़ी ,पर हृदय न जाने क्यों खुद को कोसने लगा – ‘कितना बड़ा अभागा हूँ मैं कि एक बार भी वचन देकर पूरा न कर सका | न मित्र की ही शादी में जा सका और न शालिनी की ही , और इस बार भी वचन देने के बाद .... यही सोचते – सोचते जाने कब सो गया वह |
   सुबह किसी के हाथ का स्पर्श हुआ | नींद उचटी, बर्थ से उतरकर खिड़की से बाहर झांका देखा तो गाड़ी जंघई स्टेशन पर खड़ी थी | तभी ‘ताजा समाचार आज – आज ’ चिल्लाता हुआ एक अधेड़ व्यक्ति खिड़की की तरफ आया और श्याम ने हाथ बढ़ाकर उससे अखबार ले लिया और पैसे देकर  पुन: अपनी सीट पर आ बैठा | पन्ने पलट – पलट कर जल्दी – जल्दी हेडिंग  पढ़ने लगा कि सहसा उसकी निगाह एक हेडिंग पर टिक गयी लिखा था –‘जलकर युवती की मृत्यु ’
     २५ दिसम्बर ,नरहरपुरा स्थित विवाहिता शालिनी नामक एक युवती की जलकर मृत्यु हो गयी | लोंगो का संदेह है कि पति ने ही उसे जलाकर मार डाला | घटना के एक दिन पूर्व मार – पीट के साथ ही गाली - गलौज की आवाज पड़ोस वालों को सुनायी दी थी |पर अभी तक वास्तविक रहस्य का पता नहीं चल पाया है |
   पेपर श्याम के हाथों से छूटकर फर्श पर जा गिरा और कानों से एक आवाज टकरायी –‘भैया परसों जरूर आना |’
                                   रचनाकाल १९८० ईस्वी